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Dying Declaration

वह सिद्धांत जिसके कारण मृत्यु कालिक कथन साक्ष्य मे ग्राहय किया जाता है,एक विधिक सूत्र मे दिया गया हैः-
‘एक व्यक्ति उसे वनाने वाले के पास झूठ वोलता हुआ नही जायेगा‘
संभवतः मेथ्यू अर्नाल्ड ने इसी कारण यह कहां है कि मरते हुये व्यक्ति के अधरो पर सत्य का वास होता है ।
एक ऐसी परिस्थिति जिसमे कि एक व्यक्ति मृत्युशैया पर होता है और जव वह मर रहा होता है तव उसके कथन को स्वीकार किया जाना चाहिये । यह एक वैधानिक कारण है, इसलिये शपथ और प्रतिपरीक्षण की वैधानिक आवश्यकता छोड दी गई है, इसके अतिरिक्त यदि मृत्युकालिक कथन का अपवर्जन कर दिया जावे,तो इससे अन्याय होगा,क्योकि गंभीर अपराध मे पीडित व्यक्ति ही एक मात्र चक्षुदर्शी साक्षी होता है और उक्त परिस्थिति मे मृत्यु कालिक कथन का अपवर्जन कर देने की दशा मे न्यायालय के समक्ष कोई साक्ष्य ही नही रह जायेगा । यद्यपि मृत्युकालिक कथन को अधिक महत्व दिया जाना चाहिये और दिया भी जाता है,किन्तु यह भी उल्लेखनीय है कि ऐसे कथन पर अभियुक्त को प्रतिपरीक्षा का अवसर व शक्ति प्राप्त नही है इसलिये मृत्युकालिक कथन ऐसे स्वरूप का होना चाहिये,जो उसका सच्चा होने के संवंध मे न्यायालय के विश्वास को प्रेरित करे ।  न्यायालय को इस वारे मे भी सतुष्ट होना आवश्यक है कि कथन करने वाला ठीक-ठाक मानसिक अवस्था मे था और जहाॅ न्यायालय एक वार सतुष्ट हो जावे कि मृत्यु कालिक कथन सच्चा व  स्वेच्छया है वहाॅ ऐसे कथन के आधार पर पुष्टि के विना भी दोषसिद्धि अभिलिखित की जा सकती है । सम्पुष्टि विधि का नही वल्कि सावधानी का नियम है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने अनेक मामलो मे मृत्यु कालिक कथन को शासित करने वाले सिद्धांतो को प्रतिपादित किया है,जिन्हे संक्षिप्त निम्नानुसार कहाॅ जा सकता है:-

1. न तो यह विधि का नियम है और न ही प्रज्ञा का,कि मृत्यु कालिक कथन को विना पुष्टि के मान्य नही किया जा सकता है । मुन्नूराजा विरूद्ध उ0प्र0राज्य 1976 ए0आई0आर0 2199  पंजाब राज्य विरूद्ध अमरजीत 1988 ए0आई0आर0 2013 और आशावाई विरूद्ध महाराष्ट्र राज्य 2013 ए0आई0आर0-341

2. यदि न्यायालय सतुष्ट है कि मृत्यु कालिक कथन सच्चा व स्वेच्छयापूर्ण है,तो विना पुष्टि के उस पर दोषसिद्धि अभिलिखित की जा सकती है । उ0प्र0राज्य विरूद्ध रामसागर यादव 1985 ए0आई0 आर0 416

                3.     न्यायालय को मृत्युकालिक कथन की छानवीन सावधानी पूर्वक करना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि मृत्यु कालिक कथन सिखाये जाने या कल्पना का परिणाम तो नही है और कथन देने वाला व्यक्ति मृत्यु कालिक कथन देते समय सही मानसिक दशा मे था । रामचन्द्र रेडडी विरूद्ध पब्लिक   प्रोसीक्यूटर 1976 ए0आई0आर0 1994

4. जहाॅ मृत्युकालिक कथन संदेहास्पद है वहाॅ विना पुष्टिकारक साक्ष्य के उसके आधार पर कार्यवाही नही की जाना चाहिये । रसीद वेग विरूद्ध म0प्र0राज्य 1974 ए0आई0आर0 332

5. मृत्युकालिक कथन जिसमे दुर्वलता हो के आधार पर दोषसिद्धि नही की जा सकती है । राममनोरथ विरूद्ध उ0प्र0राज्य 1981एस0सी0 सी0 दाण्डिक 581

6. केवल  इसलिये कि मृत्यु कालिक कथन मे धटना के सवंध मे विस्तृत विवरण नही है, निरस्त नही किया जाना चाहिये । महाराष्ट्र राज्य विरूद्ध लक्ष्मीपति नायडू 1981 ए0आई0 आर0 617

7. साधारणतः न्यायालय इस वारे मे सतुष्ट होने के लिये कि मृतक मृत्यु कालिक कथन करने के लिये उचित मानसिक दशा मे था, चिकित्सीय साक्ष्य को देखती है किन्तु जहाॅ चक्षुदर्शी साक्षीगण के अनुसार मृतक उचित मानसिक दशा मे था,वहाॅ चिकित्सीय राय उॅचा स्थान नही रख सकती है । नन्नूराम विरूद्ध राज्य 1988 ए0आई0आर0 912
आशावाई विरूद्ध महाराष्ट्र राज्य 2013 ए0आई0आर0-341 के मामले मे माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह अभिधारित किया है कि मृत्युकालिक कथन लेखवद्ध करने हेतु कोई विशिष्ट प्रारूप या प्रक्रिया विहित नही की गई है और न ही यह आवश्यक है कि मृत्युकालिक कथन सदैव मजिस्टेªट के द्धारा ही लेखवद्ध किया जावे । माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह भी अभिधारित किया है कि प्रत्येक दशा मे यह आवश्यक नही है कि मृत्युकालिक कथन पर कथन देने वाले व्यक्ति की मानसिक समर्थता का चिकित्सक से प्रमाण पत्र लिया ही जावे । 
कमलसिह विरूद्ध मध्य प्रदेश राज्य 2010 आई0एल0आर0 (एम0पी0) 1997 के मामले मे माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह अभिधारित किया है कि यह आवश्यक नही है कि मृत्यु कालिक कथन सदैव प्रश्न उत्तर के रूप मे हो। 

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