दुर्घटना स्वयं मे ही एक भयावह शब्द है और जव दुर्धटना मे किसी व्यक्ति या स्त्री की मृत्यु हो जाती है तव उन पर आश्रित व्यक्तियो को होने वाली क्षति की पूर्ति हेतु विधायिका ने एक कल्याणकारी विधि का निर्माण किया और उस विधि के अधीन अधिकरण के द्धारा प्रतिकर का निर्धारण किया जाता है । यद्यपि मानव के मूल्य को तय करना अत्यंत ही दुष्कर कार्य है । दुर्धटना के कारण हुई किसी पुरूष, महिला या वच्चे की मृत्यु होने की दशा प्रदान किये जाने वाले प्रतिकर के निर्धारण का गुरूत्तर कार्य अधिकरण के हिस्से मे है।
हम प्रतिदिन प्रतिकर का निर्धारण कर अवार्ड पारित करते है और यह मान कर भी चलते है कि प्रतिकर निर्धारण करने मे क्या समस्या है। हमारे सामने जो भी न्याय दृष्टांत प्रस्तुत हुआ है हमने उसे आधार मानकर अवार्ड पारित कर दिया । विभिन्न न्याय दृष्टांत है विभिन्न परिस्थितियां है विभिन्न तथ्य है और विभिन्न विचार है।
विभिन्नता मे एकरूपता लाने के लिये एकेडमी के द्धारा लगातार सेमीनार किये जा रहे है और समय-2 पर संस्थान मे वुलाकर भी मार्गदर्शन दिया जा रहा है इसलिये यह हमारा दायित्व वनता है कि हम भी प्रयास करे और जो कुछ कर रहे है तथा कर चुके है उसमे आवश्यकता अनुसार परिवर्तन करे । एकेडमी का प्रयास तभी सभी सफल होगा,जव हम प्यासे हो और हमे तलाश हो । यदि हमको परिपूर्णता का आभास है तो व्यर्थ है ।
मोटरयान अधिनियम 1988 की धारा-166 और 163क के अधीन दुर्धटना मे हुई मृत्यु के मामलो मे आवेदन प्रस्तुत होने पर अधिकरण विहित प्रक्रिया के अधीन कार्य करते हुये प्रतिकर का निर्धारण करता है । यहां सर्वप्रथम यह उल्लेखनीय है कि क्षति मामले के निराकरण मे साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान कठोरता लागू नही होते है ।
Strict Rules of Evidence are not applicable:
Mahendra Kumar Vs. Ramswaroop and Others, 2011 (3) MPLJ 310
Ram Swaroop Sharma Vs Ram Murthi, 2004 (ACJ) 1697 (M.P.)
प्रतिकर के निर्धारण के समय निम्न विन्दु विचारणीय होते हैः-
1.
दुर्धटना का होना और दुर्धटना के कारण ही मृत्यु का होना प्रमाणित होना चाहिये ।
2.
मृतक की आयु (Age of deceased)
3.
मृतक की आय (Income of deceased)
4.
मृतक पर आश्रित की संख्या (No. of dependent)
5.
प्रयुक्त किये जाने वाले गुणक (Use of multiplier)
6.
भविष्य की संभावना (Future prospects)
7.
की जाने वाले कटौती (Deduction)
दुर्धटना का होना और दुर्धटना के कारण मृत्यु का होना प्रमाणित होना चाहिये ।
वर्तमान मे जिस प्रकार से दुर्भाग्य रूपी दुर्धटना को लक्ष्मी रूपी सौभाग्य मे परिवर्तित करने के लिये पक्षकार/अभिभाषक/चिकित्सक और पुलिस एक संगठित गिरोह के रूप मे कार्य रहे है वहां अधिकरण पर यह प्रवल भार आ जाता है कि वह लोक कल्याणकारी उददेश्य से विधायिका के द्धारा निर्मित इस कल्याणकारी विधि का दुरूपयोग का न होने दे और पीडित को युक्तियुक्त प्रतिकर प्रदान करे ।
युक्तियुक्त प्रतिकर के संवंध मे सैयद बसीर अहमद विरूद्ध मोहम्मद जमील 2009 ए0आई0आर0-1219 उच्चतम न्यायालय का न्यायिक दृष्टांत अवलोकनीय है ।
वर्तमान समय मे जिस प्रकार से फर्जी और कूटरचित दस्तावेज के आधार पर विधायिका द्धारा निर्मित इस कल्याणकारी अधिनियम का दुरूपयोग हो रहा है और स्वयं माननीय उच्चतम न्यायालय ने फर्जी क्षति याचिका प्रस्तुत होने पर चिंता जाहिर करते हुये उनकी रोकथाम वावत निर्देश दिये है वहां यह आवश्यक हो जाता है कि हम सव पूर्ण गंभीरता के साथ सर्वप्रथम यह विचार करे, कि क्या वास्तव मे कोई वाहन दुर्धटना हुई है और क्या उस वाहन दुर्धटना के कारण किसी व्यक्ति का निधन हुआ है ?
वर्तमान मे प्रायः सभी अधिकरण अत्यधिक भावुक होकर यह मानते हुये कि पुलिस ने अनुसंधान के दौरान दुर्धटना का होना प्रमाणित पाया है क्षति याचिका के निराकरण मे समुचित साक्ष्य के अभाव मे ही दुर्धटना का होना प्रमाणित मानकर अवार्ड पारित करते रहे है जिसका दुष्परिणाम यह है कि आज दुर्धटना से भिन्न रीति से मृत्यु होने पर संगठित गिरोह के रूप मे कार्य करने वाले व्यक्ति उस मृत्यु को दुर्धटना का जामा पहनाकर आम जनता की धनराशि को लूट रहे है ।
साक्ष्य के अभाव मे केवल पुलिस प्रपत्र के आधार पर अधिकरण यह मान लेता है कि वाहन चालक की लापरवाही या उपेक्षा है जवकि ओरियन्टल इन्सुरेन्स कं0लि0 विरूद्ध प्रेमलता शुक्ला व अन्य 2007 ए0सी0 जे0 1928 के मामले मे माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया है कि मोटर यान अधिनियम की धारा 166 के अधीन प्रतिकर के मामले मे क्षतिधन हेतु वाहन की उपेक्षा और लापरवाही प्रमाणित करना आवश्यक है । यद्पि दुर्धटना की रीति वाहन चालक को प्रमाणित करना होती है परन्तु उसका आशय यह नही है कि हम सदैव वाहन चालक की उपेक्षा या लापरवाही मानकर ही चले ।
नेशनल इंसोरेंस कं0लि0 विरूद्ध प्रेमवाई पटेल(2005)6 एस0सी0 सी0-172 के मामले मे भी माननीय उच्चतम न्यायालय ने कर्मकार प्रतिकार अधिनियम की धारा-4 और मोटरयान अधिनियम की धारा-166 के मध्य विभेद करते हुये कहां है कि मोटरयान अधिनियम की धारा-166 के अधीन प्रस्तुत आवेदन मे उपेक्षा प्रमाणित करना होती है ।
कई वार दुर्धटना सयुंक्त उपेक्षा व लापरवाही के कारण भी होती है और जहां तत्सवंध्ं मे समुचित साक्ष्य उपलब्ध है वहां हमे मृतक की उपेक्षा व लापरवाही का प्रतिशत भी निर्धारित करना चाहिये । यदि हम सयुंक्त उपेक्षा या लापरवाही की साक्ष्य होने के वाद भी उसे अनदेखा करते है तो अप्रत्यक्ष रूप से हम मोटरयान अधिनियम के उपवंधो ‘‘जैसे कि अपनी सही दिशा मे चलना,इंडीगेटर देना,गति को सीमित रखना आदि" के उल्लधंन को प्रोत्साहन देते है और दूसरे पक्ष के प्रति पूर्ण दोष न होने के वाद भी दंडात्मक कार्यवाही करते है
मृतक की आयु का निर्धारण
जहां मृतक की आयु के संवंध मे शैक्षणिक दस्तावेज या जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया है वहां मृतक की आयु के निर्धारण मे कोई परेशानी नही होती है परन्तु जहां आयु के संवंध मे कोई भी विश्वसनीय दस्तावेज प्रस्तुत नही किया जाता है वहां अधिकरण को कई वार आयु के निर्धारण मे परेशानी का सामना करना पडता है ।
जहां कोई भी दस्तावेज आयु के संवंध मे प्रस्तुत नही हुआ है वहां प्रथम एम0एल0सी0 और शव परीक्षण प्रतिवेदन मे उल्लेखित आयु पर विचार किया जा सकता है क्योकि दुर्धटना के वाद जव आहत को प्रथम वार चिकित्सक के समक्ष लेकर जाया जाता है तव तक आहत व्यक्ति या उसके साथ का व्यक्ति किसी गिरोह के सम्पर्क मे नही आ पाता है इसलिये प्रायः वहां सही आयु लिखा दी जाती है । वाद मे आयु मे अत्यधिक अन्तर आ जाता है, इसलिये आयु के निर्धारण के लिये भी अधिकरण को अत्यधिक जागरूक होने की आवश्यकता है ।
कई वार मृतक के वच्चे अध्ययनरत होना वताये जाते है वहां अधिकरण उन वच्चो के शैक्षणिक दस्तावेज मंगा सकता है ऐसे दस्तावेज भी आयु का अनुमान लगाने मे सहायक हो सकते है । मृतक की आयु के संवंध मे उसका ड्रायविंग लायसेन्स,आयकर का पैनकार्ड,मतदाता परिचय पत्र,आधार कार्ड,राशन कार्ड आदि पर हो सकते है ।
मृतक की आय
जहां मृतक शासकीय नियोजन मे था या उसकी कोई निर्धारित आय थी या उसके द्धारा नियमित रूप से आयकर अदा किया जाता रहा है वहां मृतक की आय के निर्धारण मे कोई परेशानी नही है । यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कई वार गिरोह के रूप मे कार्य करने वाले व्यक्ति मृतक का एक साथ तीन-तीन वर्ष का आयकर अस्सिमेंट जमा कर देते है वहां ऐसे अस्सिमेंट के आधार पर आय का निर्धारण करना उचित नही है ।
जहां मृतक की आय के वारे मे कोई भी विश्वसनीय साक्ष्य नही है वहां अधिकरण कलेक्टर द्धारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी को आय का आधार वना सकता है । न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1848 के अधीन सक्षम प्राधिकारी कुशल और अकुशल श्रमिक की न्यूनमत मजदूरी तय करता है जिसके वारे मे साक्ष्य अधिनियम की धारा-57 के अधीन न्यायिक अवेक्षा की जा सकती है ।
1.
रामजीलाल विरूद्ध औकारलाल 2004 ए0सी0जे0-238
2.
गोविन्द यादव विरूद्ध न्यू इंडिया इन्सोरेंस कं0 लि0 (2011) 10 एस0सी0सी0-683
गृहिणी महिला की मृत्यु की दशा मेः-
ग्रहिणी की मृत्यु की दशा मे उसकी आय का निर्धारण करना अत्यंत ही दुष्कर है क्योकि ग्रहिणी के कार्य और उसकी सेवा का कोई मूल्य नही होता है । यह अत्यंत ही दुर्भाग्य जनक है कि ग्रहिणी की मृत्यु होने पर हम आसानी से कह देती है कि वह कोई कार्य नही करती थी,इसलिये उसकी आय न्यूनतम मान ली जाती है जो कि पूर्णतः गलत है ।
ग्रहिणी की आय के संवंध मे:-
लता वाधवा विरूद्ध विहार राज्य 2001 एस0सी0-3218
अरूण कुमार अग्रवाल विरूद्ध नेशनल इं0क0लि0(2010)9 एस0सी0सी0-218
कई वार मृतक की मृत्यु के कारण प्रत्यक्ष हानि नही होती है या मृतक की मृत्य के वाद भी आय यथावत रहती है जैसे की कृषि भूमि से आय होने की दशा मे,
1.
न्यू इंडिया इंसोरेंस कं0 लि0 विरूद्ध चारली 2005
एस0सी0-2157
ट्रासपोर्ट के व्यवसाय मेः-
2.
न्यू इंडिया इंसोरेंस कं0लि0 विरूद्ध योगेश देवी (2012) 3 एस0सी0सी0-613
कोई भी शासकीय सेवक टयूशन आदि से अपनी आय होना वताता है तो वह विचार योग्य नही है,क्योकि शासकीय सेवक को टयूशन की अनुमति नही है ।
न्यू इंडिया इं0क0लि0 विरूद्ध सरोज 2007 ए0सी0जे0-558
मृत्यु के वाद यदि वेतन मे कोई वृद्धि होती है तो वह विचार योग्य नही है।
ओरियंटल इं0क0लि0 विरूद्ध जस्सुवेन 2008 ए0आई0आर0-1734
व्याज,कन्वेन्स एलाउन्स,ओवर टाईम मृतक की आय के रूप मे नही जोडे जा सकते है ।
प्रेमचन्द्र खाटवानी विरूद्ध गोपाल ठाकरे 2005 ए0सी0जे0-980
खुखमणि विरूद्ध जगदीश 2011(4) एम0पी0एच0टी0-261
आयकर की कटोती के वाद जो वेतन वचता है उसे ही वास्तविक आय माना जाना चाहिये ।
सरला वर्मा और
विमल कनवर विरूद्ध किशोर दान 2013 ए0सी0जे0-1441(अनुकम्पा नियुक्ति के कारण मिलने वाले वेतन प्रतिकर की राशि मे से कम नही किया जा सकता है)
क्या प्रतिकर में से एक्सग्रेसिया का भुगतान कम किया जाना (अर्थात काटा जाना) अनुमत है ? अभिनिर्धारित किया गया, नहीं। राज्य सरकार व भारत संघ और उसके अधीन उद्यम जिसमें बैंक भी शामिल है, उन्होंने एक नीति जारी की है कि यदि परिवार के सदस्य द्वारा अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन किया जाता है व अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जाती है तब परिवार को एक्सग्रेसिया राषि भुगतान की जायेगी । अतः यह राशि प्रतिकर में से नहीं काटी जा सकती।
Sandhya and others v. Guddu and others 2015 ACJ 168
मृतक पर आश्रित की संख्या
सरला वर्मा वाले मामले को आधार वनाया जाना चाहिये ।
मृतक पर कितने वास्तविक रूप मे आश्रित है का निर्धारण भी अधिकरण को करना होता है क्योकि आश्रित के निर्धारण के वाद ही व्यक्तिगत जीवन निर्वाह भत्ता की कटोती की जा सकती है ।
अ. यदि मृतक विवाहित है और उस पर 2 से 3 आश्रित है तो उसकी आय का 1/3 भाग
ब. यदि आश्रित 4 से 6 है तो 1/4 भाग
यदि मृतक अविवाहित है तो
अ. आय का 1/2 भाग
ब. यदि अविवाहित मृतक पर उसकी विधवा मां और न कमाने वाले छोटे भाई-बहिन आश्रित है तो 1/3 भाग
पिता,भाई और वहिन को मृतक पर आश्रित नही माना जाता है जव तक कोई विपरीत साक्ष्य न होः-
जैसे कि पिता, भाई और वहिन विकंलाग है । वहिन विधवा होकर ससुराल से परित्यक्त है उनकी आय का कोई साधन नही है ।
1. सरला वर्मा विरूद्ध देहली ट्रासपोर्ट कार्पोरेशन 2009 ए0 सी0जे0-1298
2. रेशमा कुमारी विरूद्ध मदन मोहन 2013 ए0सी0जे0-1253
3. संतोष देवी 2012 एस0सी0-2185
विधवा महिला के पास आय का साधन होना या आश्रित व्यक्तियो का आय अर्जित करने वाला होना मात्र प्रतिकर देने से इंकार करने का आधार नही हो सकता है, क्योकि विधायिका का ऐसा कोई उददेश्य नही है
1. चंदा देवी विरूद्ध प्रदीप कुमार 2006(3)एम0पी0वीकली नोट-122
2. चंदनसिह विरूद्ध एस0ई0डव्लू कन्सट्रक्शन कं0 2003 (1) जे0एल0जे0-246
गुणक किसकी आयु पर
सरला वर्मा और रेशमा कुमारी के मामले गुणक के निर्धारण के लिये उपयुक्त है
गुणक मृतक की आयु के आधार पर ही निर्धारित किया जाना चाहिये ।
15 वर्ष तक 15 का गुणक
15 से 25 वर्श की आयु के लिये ‘18’ का गुणक होगा ।
26 से 30 वर्श की आयु के लिये ‘17’ का गुणक होगा ।
31 से 35 वर्श की आयु के लिये ‘16’ का गुणक होगा ।
36 से 40 वर्श की आयु के लिये ‘15’ का गुणक होगा ।
41 से 45 वर्श की आयु के लिये ‘14’ का गुणक होगा ।
46 से 50 वर्श की आयु के लिये ‘13’ का गुणक होगा ।
51 से 55 वर्श की आयु के लिये ‘11’ का गुणक होगा ।
56 से 60 वर्श की आयु के लिये ‘9’ का गुणक होगा ।
61 से 65 वर्श की आयु के लिये ‘7’ का गुणक होगा ।
66 से 70 वर्श की आयु के लिये ‘5’ का गुणक होगा ।
सहचर्य की हानि 1,00,000/-Loss of consorium
दाह संस्कारः- 25,000/- Funeral expenses
प्यार-स्नेह 25,000/- Loss of Love and affection
भविष्य की संभावना (Future Prospect)
सरला वर्मा के मामले के अनुसार
यदि मृतक की आयु 40 वर्ष से कम है तो 50 प्रतिशत
यदि 40 से 50 के मध्य है तो 30 प्रतिशत
50 के वाद कुछ नही ।
रेशमा कुमारी विरूद्ध मदन मोहन 2013 ए0सी0जे0-1253 दिनांक-02.04.2013 के मामले मे यह कहां गया है कि सरला वर्मा के मामले मे प्रतिकर के निर्धारण हेतु दिये गये निर्देश का पालन किया जावे ।
राजेश विरूद्ध राजवीर (2013)9 एस0सी0सी0-54 दिनांक-12.04.2013 मे रेशमा कुमारी वाले मामले को विचार मे नही लिया गया है इसलिये लाॅ आॅफ प्रेसीडेन्ट के अनुसार रेशमाकुमारी का मामला वंधनकारी प्रभाव रखता है ।
इसलिये भविष्य की संभावना के मामले मे सरला वर्मा और रेशमा कुमारी का मामला ही वर्तमान मे विचार योग्य है ।
163ए के मामले मे सहचर्य, सम्पदा की हानि और दाहसंस्कार का खर्च शेडयूल के अधीन ही देय होगा, क्योकि सरला वर्मा या राजेश विरूद्ध राजवीर के मामले मे उक्त शेडयूल पर विचार नही किया गया है ।
अविवाहित की दशा मे गुणक माता की आयु के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिये:-
श्रीमति शांति पाठक एआईआर 2007 एससी 2649 तीन न्यायमृर्तिगण की पीठ निर्णय चरण 7 के अनुसार मृतक के माॅ की उम्र 65 वर्ष को देखते हुए 5 का गुणांक उचित माना गया है । पश्चातवर्ती मामले मुन्नालाल आदि मे उक्त न्यायिक दृष्टांत को विचार मे नही लिया गया है ।
Jakir Hussein and others v. Dinesh and others 2015 ACJ 961 (M.P.)
वच्चो की मृत्यु की दशा मे
R. K. Malik and another v. Kiran Pal and others, AIR 2009 SC 2506 का न्यायिक दृष्टांत अवलोकनीय हैं।
इलाज का पर्चा पेश करना चाहिए।
कमलेश बाई विरूद्ध सूर्यप्रकाश एवं अन्य 2003(3) टी.ए.सी.-523 (एम.पी. एवं ललिताबाई एवं अन्य विरूद्ध अमीन खान एवं अन्य 2000(2) टी.ए.सी.-506 (एम.पी.को प्रस्तुत किया गया है, जिनमें माननीय उच्च न्यायालय द्वारा यह मत दिया गया है कि क्लेमेंट को उसके द्वारा प्रस्तुत दवाई खरीदने के बिलों/कैश मेमो के संबंध में चिकित्सक का प्रिस्क्रिप्सन या पर्चा प्रस्तुत करना चाहिये और दवाई खरीदने के बिल आसानी से बाजार से प्राप्त किये जा सकते हैं ।
1. दुर्धटना का होना
2. दुर्धटना के समय मृतक की आयु
3. मृतक की आय
4. आश्रित की संख्या
5. उपयोग किये जाने वाला गुणक
6. चिकित्सीय व्यय
7. भविष्य की हानि