प्रत्येक दांडिक मामले मे यह आवश्यक नही है कि परीक्षित कराये गये प्रत्येक साक्षी द्धारा घटना का समर्थन अनिवार्य रूप से किया जावे । सम्पुष्टि प्रज्ञा का नियम है न कि विधि का । इस सवंध मे पत्तूलाल विरूद्ध पंजाव राज्य 1996 ए0आई0आर0उच्चतम न्यायालय 3197 का न्यायिक दृष्टांत अवलोकनीय है । एंकाकी साक्षी का कथन यदि वह पूर्णतः विश्वसनीय है तो दोष्सिद्धि का आधार हो सकता है और उसके कथन के आधार पर दोष्सिद्धि अभिलिखित की जा सकती है इस सवंध मे वहुलाभूषण विरूद्ध तमिलनाडू राज्य 1989 ए0 आई0 आर0 उच्चतम न्यायालय 236 और मुन्ना उर्फ पूरन विरूद्ध मध्य प्रदेश राज्य 2009 ए0आई0आर0 उच्चतम न्यायालय 1344 का न्यायिक दृष्टांत अवलोकनीय है।
Thanks sir
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