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Temporary Injunction

एक अतिक्रामक के हित मे साम्या पर आधारित अस्थाई निषेधाज्ञा की सहायता प्रदान नही की जा सकती है ।  केदारसिह विरूद्ध महिला गीतावाई 1997 म0प्र0वीकली नोट 10 और कन्हैयालाल विरूद्ध जियाजीराव कॉटन मिल्स 1983 म0प्र0वीकली नोट 119 का न्यायिक दृष्टांत अवलोकनीय है ।


जहॉ साक्ष्य अभिलिखित किये जाने की आवश्यकता हो,वहॉ वादगत सम्पत्ति को वाद प्रस्तुति दिनांक की स्थिति मे सरंक्षित करना उचित है क्योकि पश्चातवर्ती अन्तरण या सम्पत्ति के स्वरूप का परिवर्तन प्रकरण के निराकरण मे जटिलता और विलभंता कारित करता है। प्रिया ठकराल विरूद्ध अमरसिह 1988 भाग-2 म0प्र0वीकली नोट 125 और दयाराम सोनकर विरूद्ध श्री निर्मल चंद सोनकर 1991 भाग-2 म0प्र0वीकली नोट 178 के मामले मे माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया है कि लंवित वाद के सिद्धान्त के होते हुये भी वाद व पक्षकारो के वाहुल्ल तथा जटिलता से वचने के लिये सम्पत्ति का अन्तरण अवरोधित किया जा सकता है ।
        श्री गंगाधर बाल विधालय विरूद्ध श्रीमति संतोश 1982 म0प्र0 वीकली नोट 328 के मामले मे माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया है कि जहॉ विधि व तथ्य के विचारणीय प्रश्न अन्तर्निहित हो,वहॉ मामला वादी के हित मे प्रथम दृष्टि मे पुष्ट होना माना जा सकता है । 

Also Refer,
  1. Kamal Singh V. Jairam Singh 1986(1) MPWN 116
  2. Mahadev Sawal Ram V. Pune Municipal Corporation (1995) 3 SCC 33
  3. Gangubai v. Sitaram AIR 1983 SC 743

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